Kanhaiya Lal Dandriyal

गढवाळि साहित्य अर सृजन

गढवाळि साहित्य अर सृजन का क्षेत्र मा कन्हैयालाल डंडरियाल जी को सिर्फ़ नाम ल्हेण पर हि गढवाळि साहित्य को

Garhwali Novel Rudri by Kanhaiya Lal Dandriyal
Kanhaiya Lal Dandriyal

एक स्वर्णिम अध्याय हम सब का समणि सैंदिष्ट ह्वे जॉंद। वूंका कृतित्व पर कुछ ल्यखण चुले पैलि क़लम कौंपण लगद त वूंका विराट व्यक्ति पर कुछ ब्वन से पैलि वाणी बीस बार स्वचद। अर स्वचणो स्वाभाविक भि च किलैकि मिल मा मज़दूरी कन वलो एक मामूली मनखी अगर “अंज्वाळ” अर “नागरजा” जनी बेशक़ीमती साहित्यिक धरोहर को सृजन करि द्या त् यना कालजयी रचनाकार क बारम् कुछ ब्वनू या ल्यखणू सुद्दि-मुद्दि बात नी च।

गढ़वाली़ साहित्य का सुप्रसिद्ध साहित्यकार कन्हैयालाल डंडरियाल जी को जन्म 11 नवम्बर,1933 खुणि ग्राम- नैली, पट्टी- मवाल़स्यूं, पौडी़ गढवाल़ मा ह्वे ।
गौं मा साधारण सी शिक्षा का बाद लगभग 20 वर्ष की उम्र मा डंडरियाल़ जी रोज़गार का वास्ता दिल्ली ऐगेन अर बिरला मिल मा बतौर श्रमिक काम कर्न लगीन्।सन् 1982 मा मिल बंद ह्वे जाणा का कारण नौकरी छुट गे अर लगभग 12 साल वूंतै जीविका का वास्ता घर-घर जैकि चायपत्ती बेचणा को काम भी कर्न पड़े।

परंतु बेरोज़गारी, आर्थिक तंगी व प्रवास की कठिन परिस्थित्यूं मा भी डंडरियाल जी बरोबर साहित्य सृजन कर्ना रैन। वूंकी ‘मंगतू’ (खंडकाव्य, सन् 1960, ‘अंज्वाल़’ (कविता संग्रह, सन् 1978, 2004), ‘कुयेडी़’ (गीत संग्रह, सन् 1990), ‘नागरजा’ (महाकाव्य -भाग 1,2, 3 व 4, सन् 1993, 1999, 2009), ‘चॉंठो का घ्वीड़’ (यात्रा वृतांत, सन् 1998) व  ‘रुद्री’ (उपन्यास, सन् 2018) जनि उत्कृष्ट कृति प्रकाशित छन ।

वूंका द्वी खंडकाव्य(‘बागी-उप्पनै लड़ै’ अर ‘उडणीगण’), चार नाटक (‘कंसानुक्रम’, ‘स्वयंवर’, ‘भ्वींचल़’, ‘अबेर च अंधेर नी’ व एक गढ़वाली शब्दकोश, कुछ कविता/लेखादि अप्रकाशित छन ।
साहित्य सेवा का वास्ता वूंतैं ‘गढ़वाल़ साहित्य मंडल, दिल्ली’ को ‘गढ़भारती पुरस्कार'(1972), ‘गढ़भारती, दिल्ली’ को ‘पं. टीकाराम गौड़ पुरस्कार'(1984), ‘उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान,लखनऊ’ को ‘डा. पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल नामित पुरस्कार'(1990), ‘गढ़वाली साहित्य परिषद, कानपुर(उ.प्र.)’ को ‘पं. आदित्यराम नवनी गढ़वाली़ भाषा प्रोत्साहन पुरस्कार'(1991), ‘जयश्री ट्रस्ट, देहरादून’ को ‘जयश्री सम्मान’ (1995), ‘गढ़वाल़ भ्रातृ परिषद, मुंबई’ को ‘गढ़रत्न पुरस्कार'(1998), ‘गंगोत्री सामाजिक संस्था, दिल्ली’ को ‘उत्तराखण्ड गौरव’ (2001) अर ‘उत्तराखण्ड राज्य लोकमंच, दिल्ली’ को ‘साहित्य शिरोमणि’ (मरणोपरान्त, 2004) आदि सम्मान भी प्राप्त ह्वेन । गढ़वाली़ साहित्य जगत का ये श्रेष्ठ रचनाकार को लम्बी बीमारी का बाद 2 जून 2004 खुणि दिल्ली मा निधन ह्वे।

लेख साभार आसीस सुन्द्रयाल़

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